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Monday, June 25, 2018

राष्ट्र बोध


जब राष्ट्र का  बोध,
पेट की आग से झुलस गया हो,
हर घर, हर जन, हर मन,
स्वार्थ लिप्सा को बाध्य हो,
स्वास्थ्य से कमजोर कायर,
डरा हुआ घबराया हो,
अशांत मन का अविश्वास,
भीड़ चाल में व्यस्त  हो,
झूठ की बुनियाद,
रेतमहल का स्वप्न,
व्यक्ति-वयक्ति के बिच दरार हो,
कैसे होगी  शांति खुशहाली,
जब संस्कृति ही लहूलुहान हो,
दूषित अन्न जल भू वायु,
मन में घृणा और क्रोध हो,
आगे बढ़ने की होड़ हो,
स्वजनों का कोई बोध हो,
कहाँ निकल गए हम,
कंक्रीटों में फँस  गए हम,
कुटिल तंत्र की यन्त्र है हम,
मानवता से दूर कहीं,
हृदयविहीन कंटक वन  में,
उलझ -उलझ कर रह गए,
ये अनसुलझी पहेली कैसी ?
जीने की कला ही भूल गए,
क्या खोये क्या पाए,
घुटन जीवन का लक्ष्य नहीं,
घृणित जीवन का कोई मूल्य नहीं,
जो थोड़ी बुद्धि शेष बची हो,
जो थोड़ी सी आशा हो,
जो थोड़ी सी हिम्मत हो,
जो थोड़ा सा साहस हो,
छोड़ो औरो से रण-द्वन्द,
करो स्वयं से यह प्रण,
जो होगा भीतर ही होगा,
क्रोध घृणा की ज्वाला में भी,
प्रेम कमल खिला रहेगा,
सत्य-स्वच्छ-निरमल हृदय में,
विकारो का कोई स्थान होगा,
मुझसे ही मेरा घर है,
मेरा राष्ट्र है,
मेरी मानवता है,
मैं कमल,
मेरा राष्ट्र कमल,
मेरी पूरी मानवता कमल,
मेरी मुक्ति,
मेरे राष्ट्र की मुक्ति,
मैं शांत मेरे राष्ट्र की शांति,
मेरा उद्योग मेरे राष्ट्र की उन्नति,
मैं खुश, मेरा परिवार खुश,
मेरा राष्ट्र खुश, मेरी मानवता खुशहाल,
हर घर, हर जन, हर मन,
स्वस्थ्य सुन्दर संपन्न सौभाग्य,
उजाला ही उजाला है,
मेरा जीवन सजने वाला  है,
जन जन मानवता का गीत गाने वाला  है,



Saturday, June 2, 2018

मैं मौन हूँ या हूँ अनन्त


अनन्त अनन्त को,
जानने का प्रयास,
नित्य नये आनन्द से,
 आनन्दित करता जीवन,
अन्तराल पर  बार-बार,
कभी-कभी ठहर सा जाता है,
व्यथित करता है,
अनसुलझा पहेली अनन्त का,
कोइ उत्तर नहि,
हर प्रश्न का अनन्त उत्तर,
और फ़िर्,
अनन्त प्रश्न सामने प्रगट  हो जाता  है,
सत्य का आभास,
क्षण  मे अदृश्य हो जाता है,
सत्य-असत्य,
प्रकाश-अन्धकार,
अच्छा-बुरा,
आदि-आदि के चक्र मे,
समय कि गति रुकती ही नहि,
अनन्त मार्ग,
अनन्त तरीके,
हर छण का प्रयास-अप्रयास,
ज्ञान-विज्ञान-ध्यान-अनुसंधान,
जीवन मृत्यु के बीच सिमित हो जाते है,
मैं,
 कौन हूँ ?
क्या हूँ ?
क्यू हूँ ?
कैसे हूँ ?
कहाँ हूँ ?
कब हूँ ?
किसने बनाया ?
कौन नष्ट  करेगा ?
कुछ पता नहि,
बनते बिगरते,
परिवर्तित होते हुए देखता हूँ,
पर,
प्रतीत होता है,
मैं कुछ नहीं,
स्वतः हि होता है,
स्वतः कैसे होता  है,
नहीं जानता,
भीतर देखता हूँ,
बहार देखता हूँ,
कुछ नहि मिलता,
अनन्त अनन्त मे  उलझ जाता हूँ,
कुछ से कुछ नहीं,
और,
कुछ नहीं  से कुछ,
क्या है ?
ये माया,
जो समझ नहीं  आता,
ये जीवन कि यात्रा,
गन्तव्य,
लोग,
जीवन मृत्यु,
अब मृत्यु हि शेष है,
कैसे उस मृत्यु को देखु होश मे ?
क्योंकि,
और कुछ शेष नहीं,
कष्ट और आनन्द का संतुलन,
कैसे बनेगा ?
स्वयं हि जानना होगा,
जान कर क्या करूँगा ?
पता नहीं,
क्योंकि, 
मृत्यु को प्राप्त बताएँगे  नहीं,
और,
जीवित बता सकते नहीं,
शायद इसीलिए,
उपनिषदों  मे कहा गया है,
जो सत्य है,
कहा नहीं  जा सकता,
और,
जो कहा जा सकता है,
वो सत्य नहीं,
शायद इसीलिए,
मुक्ति समाधि के सारे उपाय,
बन्धन,
गले का फाँस  प्रतीत होता है,
जो और परतंत्र करता  है,
स्वतंत्रता  एक स्वच्छ  बहाव है,
बहते रहना,
स्वयं को समय पर छोर देना,
मैं स्वयं मेरा नृत्य हूँ,
संगीत हूँ,
मौन हूँ,
मैं ही  चेतना हूँ,
अनन्त  हूँ,
मैं ही  मेरा पहेली हूँ,
 मैं ही मेरे रूपों से,
अनन्त से,
अपरिचित हूँ,
जलते हुए,
बुझते हुए,
स्वयं से स्वयं को प्रगट होते,
अनन्त  से अनन्त मे लीन विलीन,
मौन ......


Tuesday, May 1, 2018

मौन

मौन से, 
जन्मते ही रोना,
और
धीरे धीरे,
दुनिया देख,
सीखना,
हँसना,
झूठ को सच करने का प्रयास,
और
सच को झूठ  
और,
अंततः,
हँसने-रोने से मुक्त,
सच और  झूठ  से परे,
मौन,
क्या है ये ?
क्या यही वो माया है ?
भ्रम है,
जो शरीर धारण करते ही,
शुरू होता है,
और,
क्रमशः,
समझ आता है,
कि जो कहा जा सकता है,
वो सच नहीं,
और,
जो सच है,
वो कहा नहीं जा सकता

Saturday, December 30, 2017

मैं मैं नहीं

चल सकोगे मेरे साथ,
क्यूँकि,
 मैं चलता नहीं,
चलते हुए प्रतीत होता हूँ,
तुम्हारा प्रयास,
तुम्हे रोकता है,
मेरे से दुर करता है,
क्यूँकि,
मैं तो लहरों पे सबार हूँ,
समय की ज्वार पे बैठा,
साक्षी भाव से मुस्कुराता,
तुम्हे देखता हूँ,
तुम्हारे डर को देखता हूँ,
पर मैं कुछ कर नहीं सकता,
क्यूँकि,
मैं इस रोमांच को साझा नहीं कर सकता,
खोया हूँ,
लीन हूँ,
प्रकृति में बिलिन हूँ,
क्यूँकि,
मैं मैं नहीं,
जिसे तुम जानते हो,
मैं तो कोई और हूँ,
जिसकी कोई स्मृति नहीं,